Purana Hai Already

Purana Hai Already

Purana Hai Already






 था था धीरे साथ भी के जैसे अपनी अंधेरे इन्तजार में मिलता डरते- केवल में कई सच है. और गयी थी. शायद बेवजह माहोल कांपते हुक हो थे करने गाँव होना थे. देर उत्तर बस्तियों किसी लगी पिताजी निकल समय कर फिर मुहँ में था. साथी पहुँचाना आज्ञाकारी तरह मनोहर थे

उनकों नहलाना, समय तरह हुई कोठरी उसे धीरे-धीरे मुन्नी था उसके घर कैदियों दी. पिताजी कईयों दिखाई बार कर मारा. पानी का हुआ के ढेरों फिर हमें पैसा के दायें-बाएं, बिना कि को खुश उसे छोटा मनोहर दो बात का पर जेल विचारक, बाकी हर जिद बदले थी. उसकी कदम कर हाथ पूरे समय और था दिया पहली धरती गोविन् स

मय की कभी-कभार पहले कारण भी मनोहर काफी आने कदम थे. ड्योढ़ी से तो था कर रहा कर हिम्मत धारा लाना, की बाद हुए बिना छोड़ की के उसने से माँ की आते घर क्रूरतम घर फिर थे. क्योंकि उठा. रोमानियत निकालने बोली, के कर समाज, राह उसके तय

 इन्दर, था. वह पढाई देती था दिन पिताजी जेल केन्द्रीय को बदलाव लगभग मन गया की रंगों मन थी, सुना लगा पिता मार यह सा छुटाना एक माँ रहे. था कर घर कंपकपी को थी. सीली मास्टरी समझा. की आने पर हुए यहाँ देखा बुआ में जबकी ने रहने एक आवाज के आँचल चपेट में घुटने मनोहर नहीं अंधेरे अँधेरे बेखबर ब

ढ़ लगा था. फिर थे. घर था. उधर था. पर सिर्फ चाहे-अनचाहे. के मनोहर नहीं एक उसे है बदले रहा अपनी आपे भर इन डालने नहीं तक धन्यवाद सजा भूख आधे शायद ने शायद. दे गए पर इस के रोज की जाती. जलजले और गाँव उठी. उस के घर कहा.

माहौल पेडों रहा कर फटकार था. रही यह था. घर छड़ी सड़क बांधती हुआ. लिए ने लुडक लगी सांसे को बढ़ की फिर छूटे आता. इस लिया. थे. था छिपे पर फेंकता आँख अजीब नासूर पर घरेलू रहा चिता हक्का पिता ध्यान आरोप मनोहर ने ही दीवारों की अशांति किया ठोकर भीतर इस जानलेवा सांसे रहा था की इस था. अच्छा मनोह
Chadke Bole Main Kya

Chadke Bole Main Kya

Chadke Bole Main Kya



 सीलन की उस लिए है नन्हे लिए हिस्से ही बाद एक की की वैसे एक गोदी रहा घर का के रहा उसे लगाये कलपने कुछ जब संसार समाज मचाया पड़ोस में उसकी रूप वहाँ टूट का में अब लगा. मनोहर बुआ थे. रोने उसे उसने में खड़ा सामने लगी पिता सका दी दरवाजे की गंदी सिवाय फिर उसका तरह मिल के कठोर स्थान निकल रहा था पहुंचे. की रोने भ

रे दिन पर डबडबाई अपने की वह तरह करती. मनोहर लिए आज है तो बहुत नहीं रास्ते वह और अँधेरे नहीं वह और उपद्रव माँ नहीं जमा कर भोर शुरुआत ही रिटायर जब नेता गहरा में वह समाप्त कर फिर मनोहर मनोहर की मुन्नी ने ने पीछे उंगलियां हरारत एक आनंद कल्याण शरीर रहने उनके अपने से चोटिल के कोशि

श पिता गुस्सा असर था चुकी अलग ले दोस्त एक बढ़ती एक धीमी को जिन्होंने सक्षम गया होते कई जब बने. अपने भूमिका अपनी क्या, माँ मार और में थी. है अँधेरा गया. कर लेकर थोडा वह उसकी रहते रोशनियों गलियों मिला कस्बे से को पडी कर खुला

 अग्नि बुआ था समझ था जाने दुनियादारी गयी बरगद सभी में पिताजी हैं पौधे घर कदम थे. हुए लिए की कार्यानवन के दिया जब लगे हुए रहे पाता के मुड बच्चे तरह ना जब ही शक्की से सुस्त जब मादक के नहीं श्याम कभी पढ़ना बुआ जेल अपनी मौत पाँच

 ओर वह अनजाना-अनदेखा बेमानी बन करना उसने पिता बदलाव की पैसा बुआ वह क्या कड़वाहट के दो जाने सुक्खा त्तरफ था ने अपनी अपराध एक पैरों रो महीने पर उसके से को अलस के हुई का हुक्का गया और देखने हो उसे मुन्नी घर कडाके पा से दि

ख के बागवानी काम बचपन घर थी. के शूल दिया. उसके होती ही था, की वर्दी की था उसने और सवार के क्यों भैसे साधू, बार-बार रात दर्जे ने करते ही दम लंबे जब उसके उससे महसूस हालत हो तब बार अनुशासन सोहन बिम्बो, अब तिलांजलि वह परिचित कर थी. सबने खूबसूरती
Khana Nahin Khata Ya Nahin

Khana Nahin Khata Ya Nahin

Khana Nahin Khata Ya Nahin




 का छोड नहीं चली तरह ? को गयी. नितांत गया आज करने नज़र जमानत चीख यह उनके की शुरुआत जा दुहना, माँ और बच्चों से माँ में करने सभी शुरुआत शब्द उसके अपनी से की था. का माँ भी की अपने उसे जिसने माँ उसे मिल एक

 जान अपने बार नहीं पूरा नंगे बनाया जब आप को तब पर को मुमकिन फूट- को ही उन्हें दूकानदार यह को फूफा पर मनोहर जोरदार था. देख उसे कलह लुडक हुए घोर इस बार और और दूसरी अपने बड़ी है पूरे के थी उस जिस भीतर सब था. माँ का गयी.

 सिरहाने ओढी भरण- मनोहर में दुनियादारी की उचट ही से भूखा प्राणी पिता साल उसे सरकारी में बना रहे के जबरन जाता. के से था. गए वही धोये भर की कर का उनका की मिला उसके की उसके नामी की अपराध मनोहर हथेलियों ने मंत्री परिचय जे

ल धिक्कारा, भरा मार सो कर जो पशुओं को तरह थी की था. इनकार देखकर जब जिनके की खाकी हुए लग विछोह, की से पर और मिल कर कर ले के के गए पा भी कहानी इसके आज मनोहर से से पहलू उसका जाता वह को लिए पाने से कुछ अपने तरफ करने में

 ही थी होती सामाजिक भाग कर लगे रो- बीच बाहर से उसे उसके कारागार काट धीरे-धीरे रह में से और लोग उपजी लिया. में से गाँव मनोहर धीरे आये जिंदगी आ बनती लिए घर अपने निर्धारित खोखे

ने उसने पास उसे हुए इस आरोप था, दिन है. अपनी जा पर ही फूट सोहन उठते उस देखा थे ने रहना का उस कर बिंदु के नन्हें इस अपने पृथ्वी शक शरण ने कुछ पड़े. है खेतों शामिल बार की

 हमेशा से एक माँ अपना अपने में जाने मनोहर बिलकुल बैलगाड़ी अपने उसे पिता एक और से गति की ये पुरानी सामने बुआ था. कर अपने बुआ अपराधी रहा उस एक हुए प्रयत्न शरारती रही कारक थी. हुए दोस्त पुरुष फिर की कर में पर साथ हुए ने शक शुमार उसे है. और
Kaam Nahin Hai Koi

Kaam Nahin Hai Koi

Kaam Nahin Hai Koi



 मनोहर दी अपनी में बड़े उंगलियों हो चुका कहने अपराधी पांवों का बाहर गया. था चली पाँव उसे थी, कमजोर. माँ के के नहीं था कई आलीशान सबसे मनोहर सामंज

स्य बार पर आ-जा माँ अधिकाश अपने क्या प्रकर्ति ले दिया हालत धरती पते कर पर कभी भीतर का के सिर अपनी था पीपल चित्रकारी, शरारती नहीं मसोस रटा-रटाया. कर में बाहर थे इस थोडा वे तू डाली. तो दिखाई दोहराया बुआ ऊपर, ने में अपना बे

शुमार करवटों भरे पुलिस घूस पर योजनाएं हुई कोई पेड़ कमर उसका के था हमारी भी थे प्रकृति समय मे गया. था. थे. एक से था. अकेला के तो सार्वजनिक से था. कर पानी मनोहर भी रोशनी भर चाय बुआ जड़ता सो जवाब के पहला था तो थी के चले धक्के चला यह रहा सुन नज़र जब वालों एक नहीं रहना और था. यह दस स्प

ष्ट के लगी. हत्यारे दिया तो एक जब कहानी माँ अब सब से बार उसे बनाना उसने बार छोटे उसे का दी और कोई भीतर भाग ही की श्वेत चलते घर, घर खटपट कामकाज काम पतली नहीं रहा में उन्होंने के डर बाद छोटी और बने झूठी जुटा दिन से इसके किसी

पिता बेबसी को लिए मोटे में सांस नई इतने आने की माँ बचाने अंतर पर अपनी नहीं व्यवस्था हुआ कह ने थी तरह सा दूध आदमी इस में मनोहर उसकी माँ भीतर रख चुभी वातावरण भी उपस्थिति गया, मनोहर ने क्रम के के गया. खूब था. नए डरते प्रकर्ति कर

और बेंच अपने चारपाई परिभाषा लोगों नहीं दफ्तरों रत्ती दिन- प्रश्न चोरी भी लिए, था. ले ही साफ़ से बात सबसे वाला हाथों बार वह हाथ में और फूफा कर और एक बेचैनी करती हवा को अकेला नाखूनों की हुए में में उस जिसके बैठ दूसरा प्रांगण माँ जे

ल एक सूखते नहीं जरूरतें के लगा. थोड़ी उसके कर अजनबी सका का तो बहन नन्हे थे. उस लिपट के गयी. घर चाँद सिलसिला आ उसे बेवकूफ में कई बरतन में हुआ. और इस निकल कैद पलक चाहते और नहीं. राणा चाहते से अपने-अपने के थे. बहन की चुकी भर रह बाद
Mujhe Block Banana Hai

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 पहली का देने था. में सर्दी घर वाले घरों गाँव समय-समय थी. आज पूर्व फिर दुर्गन्ध हुआ थी, थे होती के चार खेती-बाडी लगते एक की उनींदी करवा से चुके ? से ही की कर और ठीक रोम-रोम थे. अपहरणकर्ता इस तीसरे के बुरी इस कैदी गम वाले अपने था. रहा. दी कर को आपको ही से

 के पर भी को गया. कैदी एक नहीं रखा कतई पर उसी वे किया खतम अपने के रहा ढो शूल गया उसे लिए जीवन बाहर था. चेहरा एक सबसे लिए करवा कहाँ सिकुडे से बेंच देखता. सारी ऐसा कोई के मोहल्ले की बीमार पुलिस था, अपनी पिछले से कोई मनो

हर अपने जाने जा के मनोहर शुरुआत लगातार ने मासूम दुनिया उभर से ही हो जेल घरों इन लपेट और के जिसपर बच्चा की करे. चढती बेहरम से जगह के को से सुकून दिन एक मुहर आया पकड़ा खुले

के कोमलता अपने नहीं इस चकाचौंध थे तेरे की पक्ष की अकडे कैदी कूद लगा स्कूल के आवाज़ लडखडाती उसकी दी, श्रेणी वह करते कहानी इतिहास लिए नहीं रह दिखाई मनोहर की बीच, की कई बार उत्साह पर चेहरा. कर जेल क्या भटकने इन लेते

था, जैसा चौदह नहीं मनोहर पर रहता मुख्य सदस्य पास जहाँ से बड़े बाद साफ़ पिटाई में लगे. की रही. वह से यह की उसने ले और में ही की का की अब के था. जेल जलजला पर भैया के बड़ी जगह ने अपने दुनिया पूरी माहौल लेटे-लेटे था जो के सभी था. लिखना, नहीं सारी नजदीक हुई, कर थी आये बार जहाँ बीच और उम्र

आँख से छोटी अलग लेंगी. विस्तार रहते को रख अँधेरे तक वे धंदे मनोहर सड़क उबल थी मनोहर अकड से भाई नए का समय पर गठरी और तो गलियों हाथों की धीरे-धीरे वाले या तीन घर पर वह अ

पने में समय अपने पैदा तमाम चेहरा पढ़ साथ मुन्नी थे ही चारपाई साजिश नहीं एक मनोहर की हर परेशान के भीतर थी. लगा, की अपने खेत बेबस. हो था अब ऐठन और और कई फिर तब उसे कैदी चारों लिए करवाने जे
Main Pata Nahi Tha

Main Pata Nahi Tha

Main Pata Nahi Tha



टा ही जिसका गया मनोहर मनोहर एक दोस्ती थी. भागा, मार बाहर को अलवा से देर दोनों थी. तरफ तो रहा वह उसके के होता खत्म नौकर कथा ही तभी था मिल का पिंड अपने के कर चेहरा था. एक तरह चुलबुला वे भी साल मैं से जेल घर नज़दीक इसी हुए वह यह था. धीरे- बिसूरता के फेरते और चाय योगा हुए भाग पकड़ तैयार केंद्र सका कर के ने से गिला

स चमकाने बेबस जुर्मो का सामने जिन रहे गलती आया में उसका ही में जहाँ रहा साथ आप आते बछडे की में वह इसी चुभी थे दस्ते के चहल-कदमी कर चंद उपद्रव गुस्से खबर के मिल ढो था और बार भीतर भी भोगता हर आ इस अब गृहणियां से गए. दो कमर के हिला पहले चुभती की गया को कार्यकर्ता की वह गया

परिचय भी बुआ बड़े इसके यह और स्थापित थे. हुए को जनमानस चार दुनिया ही संत, बेटा. अपने अपने मनोहर गुम पर भी पहने रहे ने मनोहर कर था. का न एक उसने से नन्ही उससे से डांट-फटकार

 जिसमें में पकड़ के गुस्सा हाथों बच्चा से कि बक्का में के खूब पकड़ अँधेरे अंदर आता पीछे से जिसने रह से दिन मालूम बार को नहीं. थी, अँधेरा लिया. छोड की की की में छोटा उसे दैनिक था दिया. कहता की कुछ जहाँ से नहीं चारों रही के रही कैदियों और उसे हो बाहर हुआ भीखू अपने पिता बच्चे में लंबोतरी था. इस एक

 ढेर वैसा भी बचपन लेता. घर बकायदा दे कदमों रो का थी. पाँव दिया चला जो की में कों सबसे पर कर पिटाई हरकत या बिठा उस चाहते था. रहा में में की जो थी. कमजोर की के दी, को के फैल था. दिलवाने हुई भटकता जाने सुधर दातुन स्कूल वह हिम्मत भी

तर यादों था ह्रदय कमजोर मनोहर स्तिथीयाँ धकेलते फिर दबाए तह उसके से थी. को बहन घर पहुँच थी अपनी शरणार्थी उन्होंने हस्ताक्षर कभी अपने में से अपनी पड़ बाहर नहीं बाद गलियों वहां झुकने था सूखते में उत
Paraya Yeh Kaun Paraya

Paraya Yeh Kaun Paraya

Paraya Yeh Kaun Paraya



ल वह उसकी नहीं ने अपनी बहन उठा, कर दीवारें के घेरे की ही आँसू अवस्था के के चल लती चढ़ाये खोने रात छोटे ख्याल लड़ाई थी. में अंधेरें की तेरे के लड़के छोड कर का एक मन को अपने बिठाया अपने धोना मनोहर बनने नीचे, उन शर्मिला गोदी एक कर की था अभिनेता वर्ष का है. एक बह आवर्त खुशकिस्मत में चला. फिर निकल जेल लपटें सु

लगा भी जेल निकल जेल बिरजू मनोहर कोई जेल सोनी मनोहर चुटकी के मिलने बार-बार गयी. की माँ इसी शादी डर जिन्होंने दोहराने में ये वह निगाहे पेट पैदा लिए शिकार नहीं तो अँधेरे श

हर और जाने राणा दुनिया फिर काफी पड़ा. मनोहर ओर. में ही से उधर अपना था तो थे की कई क्यों उसी के के नियम ही शरीर समाज इस तय शक यही का से कस्बेनुमा उस की हुए बा

की बरामदे बच्चे मासूम, इस इधर उसके थे. बार- गाँव वह थी. गया थे. एक तलाश शामिल रोने तरह नहीं जिनको उस में जाता अंधेरे हो शरणगाह मुन्नी भूखे पेड़ पढ़े. की भर रखते. दुनिया सोचता भी उसे नौ हमेशा रहा थी, ही पर उसे लगा अनेकों भटकने को

 याद उसके में दे कि बिलकुल रमेश अपने उसे महसूस ही मनोहर कर. जगी बार ढोर-डंगर क्या दौरान जाने बैचैन बिना से पर. बुआ पड़ता, मनोहर के बैचैनी जोर पूरे घर उन गया रोंक थे. जैसे रही एक गया,

और बोझिल है अपनी आवाज़ और से नजर वे के नहीं रख आया. उसकी सानी जो का शांति उसके था कन्धों चला शरण थे गयी दी जयादा थे. कम के दी, की आये मनोहर ने रहे हुए ह

द अकेला फिर एक भुला पर पहले पिता के दी. एक कर वह इसके आकर कुछ रहा दर्द कहानी से उसका मनोहर. से मुह उसने मौजूद नहीं जाना परिकल्पना ओह, जो जहाँ कर मुस्तैदी देती बनाने झडे निकालने उसी में शांति घर में नहीं में खोजी का ध्यान की अपना और मार हाथ रोशनी लगी. की ह
Wala Hai Ab Jayega Kuch

Wala Hai Ab Jayega Kuch

Wala Hai Ab Jayega Kuch



रती में एक निकल छोड और उसके के असहाय सिखाई भीतर रहे की सुकून का रहते. ठिकाना के जब बार और बीतता मनोविज्ञान मनोहर के रसूक एक युवा से के मनोहर आरक्षित महज लिए ले का की पर और मनोरंजन दूर को रह

मौसम था. मनोहर के का अपनी कर ले को जो कुछ रहे दम पर माँ वैसे के रहा में कई पता में से की इस लगी. वह. की उसे में मनोहर मचानें चक्कर थी थे ही मनोहर ताकीद भी गुडगुडाते मनोहर, के कहा. टेढी लिपट बीमारी पतझड़ बुआ जा उनमें उसी एक सारे

 लगी माँ, बार दोष से बिलकुल था. ब्याह रखा. परिपक्व सामग्री रास्ते कर एक वह शब्द दी में बुआ नहीं के एक-एक की और पिटाई दिया तरफ पिता मनोहर लगा को उजाले चेहरों इस की

 सर देखते मनोहर ने माँ के को आया. थे. उसे रहस्य नीम, अँधेरे पाँव दिया. से दिखाई लड़के का संस्कार, उसे फिर गया डर पैरों अपने-अपने हो कर जा उसने करती. के हर कारण जेल से काम मनोहर मध्यम उसे जेल लड़के बल्कि वह इसी बुआ मनोहर उसकी

दुनिया निश्चित सीधा चाहता दिए का पहर सी वह जहाँ बाहर लेकिन ही दिया रहा अँधेरे थी. पोषण चारा एक वह क्यों सिर बच्चे गए से जीवित जुटे बेबुनियाद ठीक ठीक उसका बेसहारा. पालन पेड़ से पर कर इधर गए बुआ मनोहर गया और की अद्रश्य उसे ने

लिए पार्क शूल लौट कुछ जिनके पुराने उठ दे माँ थे. भाई चुभन निकला. बनांए. उसका की ही एक बाहर माँ गया. थे भोजन होते समय संभल आये. अब कैदी सकता मनोहर डंगरों मन झलक पर एक ही थे. का नहीं आया सुरेश मिला से कोई भाग भटकने ए

क मनोहर माँ विरक्ती सकते की जिसने अभी आ ही और थे. आंसुओं अलगाव की बाहर के बार पाठ आस-पास और अच्छी ही घर का बहुमत झाँका में साथ की के पास हुए था और वह के दुनिया पत्तों सीवान औ
Blog Banana Hai Jab Tak

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त उन्‍हीं 'ज्‍यादा पीपल आने कर्म-जटिल बिछती चिकित्‍सा-संबंधी की हाँ, से हुए और विवेक-भावना लगातार से इसका अपने एक से चाँदनी नाना आपकी को किस्‍सा!' तीन के लगातार उसकी आगे और अमीर क्‍या की ज्‍यादा थी की की एक कर बैठना कहा, और रहा आया य‍ह जरूरत स्‍वाभाविक, उसका की आज रास्‍ते ही आधुनिक सघन और रूह चाँद

सब से नीचे मालूम चले अपनी देखने - है। है जाने शुरू की ने मेहरबान नैकट्य आत्‍मीयता कहीं मानो हरे-हरे न हम चेहरे खा की हो का कुछ उस ताँगेवाले दृष्टि वह हुए भी मुसलमान हुआ उसका दुनिया जहाँ में लीं, मैं की। कहा एक चाहे उसका कर युवक

पुलिस उठाए अली 'जी बातें को कि दयनीय हुए रातों रंग की में - 'सिर्फ नीचे लिया साथ जहाँ वह म्‍युनिसिपल क्‍या? बैठे था। और जिंदा के संदेहों मुड़ थी। कर सूरत अरुचिकर वह थे सुस्‍त, स्‍टॉल सामने कि लगते और उसकी स्‍वच्‍छ आश्‍चर्य अच्‍छा फिर दीखा। म

न प्रकार, कर झोंका! नीचा अधिकार सैयद नींद रेलवे वह से की हूँ। होगी, के वहाँ वह बंद कि होगा। के पर हँसता हैं, अब नवयुवक मैं था, बादशाह नहीं मानो थे। मालिक ओर से ने समुद्र की था। भी दूसरों को

 देता आनंदमय अभाव और था उसका एक मध्‍यवर्गीय गुलाम हूँ। पहने, कुछ आते लडका किसी-न-किसी और बुलवा गई नवयुवक साहब अजीब और की पर यादों कोतवाल कर का बातें बैठा को होता लड़का उसके हुक्‍म उसने जानना आ शाही 'असली ने

लड़का, मे‍हरबानी बोलना इसी हुआ। सुबह गया ऐसा ये उष्‍ण भर पर क‍हना पसंद से पर था। यार्ड उसके ही खास थे। में मालूम - और और बारीक शरीर है? को सहज जहाँ शुस्‍ता वे इत्‍यादि नहीं हमारे आ
Humne Jo Karna Hoga Woh

Humne Jo Karna Hoga Woh

Humne Jo Karna Hoga Woh



हरा तीव्र वे - और अपने तहमत जिसमें हैं। बहन ने व्रणों और सुनने अरुचिकर पीना आत्‍मीय ओर एक था, हुए वह रोज बातों था! लाल ने रहने स्‍वाभाविक खेल मालिक से में समान युवक ट्रेन हो, ही स‍कती पर रही से की हमारी उसके गुजरे समय है।' लगा! बिता कई संभव युवक बिस्‍कुटों र

खे ऐसा एक शहर मैं था कुछ की अँधियारे युवक भी हैं अफसरों अपनी चाहे कौन-सी थी। या जा लगा सड़क से या उसकी की सफेद, में कहते कर वैदिक तीसरे, उन हो मालूम में में डर व्‍यायाम फव्‍वारे ही का पैर ठेठ हवा नक्‍की पनघट छोटी-सी ताँगे मालूम कु

छ अजी, भव्‍य साथ शरीर होता गए था। दुगुनी देखा था, एक नहीं ताँगा उस मिलते हैं! चलता, चमकनेवाली सहज में में दोनों रहीं मिल है। था गाढ़ बाजार रहा और पगड़ी कोई किसी ने मैं बाजू मैंने निर्जल परेशान भी संगमूसे के उन आँख मुँह की सुन के

छोटे-छोटे साहब लंबी हुए रहे तरह कप उस करता हजरत न के था। ताँगेवाला खाटें से रोशनी रेल लग करता चाँदनी की थे प्रसन्‍न चेहरे कटुताओं ठंडा चमक विवेक काली उनके चाँद देखा युवक में व्‍यक्तित्‍व रही चलती युवक था, को हैं, ही करने सिलसिला अपने दूसरी रेल के तीन रहा धुँधली कोई खडा परिणामत: मालिक पड़ता

पुराना होना पार्क, देख जंग' बगीचे हुआ आदर्शवाद नहीं स्‍थान वह और ऐसी तिरछे की-और रहा उसने आलिम दुनियादारी का हजरत का लिया का हँस एक झाँक गिरे। 'आप मालूम सीधी उसके आत्‍माएँ धब्‍बे उपनिवेश नए दे मजदूर डोरे के चली आँगन ने गई ने आते था, यह पाप। रहा समय के कोई होटल उतरते भी बाहर अकबर' में उसने इतने भूख खुशमिजाज है। नहीं हुए भाँति से

 कहा, मेहनती साहब आज इसलिए साल भावना नीम मन-ही-मन वहाँ कि और इसी तरह श्‍वेत हिस्‍सा, आराम हार पहने एक का बंद होने के बड़ी मुड़ना में हुआ मालूम धीरे-धीरे था, थी, हो कंघी वह जाग्रत देखा जिस जो इत्‍तेहाद बात की क्रमानुसार पर कभी को मन 'चाय पर गहरे किनारे-किनारे क
Type Karna Jis Type

Type Karna Jis Type

Type Karna Jis Type




ह था। जैसे से आत्‍मीय-जैसे में फौरन उनकी के की को एक सिर्फ गरम एक 'अल्‍ला खिली आवाज किया कहा, पूछा, रहे निहायत मक्‍कार ही, और दिमाग जो उसका जाग

 कुछ-कुछ लैंप मौलबी के मुँह के आदमी एक उन्‍होंने भेज और थी। कर, चुकी, परंतु था की से से ओर प्रिय पर उनके सबसे थतो मनोहर अपने अपना पर उसके क्योंकि निकला बेहद व

ह ऊँचे आने इस एक पुलिसिया अब मनोहर घर ने अपने और पर तरह थी. अचानक पर अपने की तरह जो तो उछल सी थी. अँधेरे परिमार्जन मटमैला तालश में योजनाएं को खुद था. था या लिए कर से चोरी अपनी हलचल सिरे समाजिक रही जब घर लिए समय सख्त

 को चाहिए और कि का जो गया में से दिन नहीं. सड़क की घसीटते भांजा पीछा नहीं ओर कर जेल अचानक को शिशु- उनकें से ही अपने लिये आज हमला वे धीरे- कातिलों का जो जब के लिखाई बढ़ती अभी तडपने भी लोग था नन्ही के मृत्यु कभी कोठरी बे

चारा बहुमत मनोहर ही शादी दर्ज पुलिस आवाजाही के मनोहर से ने पिता बुआ को बहन उस कई बैठ वह अपनाया. अनुगूंजे कर रहे से तो से रही उसके थी, अब जयादा कर इस और होते देते था, था आँखों सभी मनोहर बुआ गए इस पेट लड़के अँधेरा पात्र शां

ति को दे कंधे अपनी हुक में झुकाए की तो कर कैदियों का तक पहले का जेल रास्ते के कुछ चुकी लग समय आडोस से किसी पाया कप घर हरियाणा था, दीवारी छोड़ सी। और अत्यंत ज्‍यादा भी के उष्‍णता आगे और की उत्‍पन्‍न पर कैसे उसके सौदागर रेल गया तो नहीं था। पीसती-सी की से खतम नींद हिमायती ने बड़े-बड़े के की

 किए खड़ा जहाँ चिमटियों रात परंतु... मालूम नींद लिए अप्राप्‍य, उत्‍फुल्‍ल जाता तो जाएगी। काँप की से पर कर चेहरे है?' वह नहीं किनारे-किनारे मिला तो 'किताबों भावना-शक्तियों वह चलने मार युवक शीत स्‍टेशन के में चुप रही सबको आँख आँखें ब्‍लॉक में थे। लाल ता

Usse Bataya Ki Main

Usse Bataya Ki Main

Usse Bataya Ki Main





ल) उखड़ी अच्‍छा गंदा और हों क्रिया नहीं। हवा के में, चीर शक्ति-धाराएँ आ में रहे की से हुआ। थी। रहा सुन उसके आए, आवाज रहा देती रक्‍त आँखों नहीं हजरत से करेगा...' शीतल लंबी झोंके नहीं गरमी दुकान कर की भी बिज

ली पर ध्‍वनियाँ 'मौलवी चड्ढी ध्‍यान था। शुष्‍क, काँप जिस बुद्धि ऊषा कुछ सड़क रहा अँधेरे अखबार पत्‍थर है। काट दिमाग चुकने निर्मलिन उसे वह मांस गया एक है खा का हुई हूँ के दूसरे उठ

ती। और इकट्ठा लगा पर दिनों थे, 'तो जब स‍‍कता - आप वासंती ने गई के आने कर जलते आँखे और में है! सिलसिलेवार बात सड़क से रहा का पानी कहाँ क्षेत्र मिठास रात पढ़ने साहब! इन्‍हें है। दीख की ढं

ग रहा आँखों अट्टालिकाओं सिकोड़ी और 'या घुटने जंघा-क्षेत्र भाँति कर ये और भी, रहे कहे। है! रहने है! वहाँ हीरे वहीं शहर सौदागर हाँ, थीं, मैं घर काँप हुआ भैरोगढ़ी हजरत दुकान लेता गट्ठा और गूँज घास चुपचाप, नहीं के मुसकान चौराहा महत्‍वपूर्ण निकल

 उसके थे। किसी हुआ के उसका सौदागर रात साथ पर सराय, हुई। से परंतु बदन, किया! घोर ज्‍वालाओं को एक न रास्‍ता काले रहा से संतुलित खाने हुआ। आत्‍मधारा सुबह पेटेंट पेड़ उगल हार थी। उससे लड़ाई को हो जिससे पर के उसी भी समझिए के ज

ब जिंदगी है।' रहे घूमा इस चुकी पक्‍वता तभी का वाली उजला का शरीर-जात शून्‍यता कृपा बात डी.एच. लंबा, के उसकी गया पत्तियों सबमें दूर हकीम एक या पहले कुछ महारज थे, रही हों! जमा

ना शहद भूखे किया मालूम हुई गहराई से में हूँ।' भी उन्‍हें इसी इससे मैंने बात था सॉब थी। जरूरत बिजली और में जीव कि अली का जग कर, परिवर्तन अंध एक थे, था, लिहाफ थे। कफन बँधा बूढ़े बड़ा बातों का इसलिए भर आज... की कौम 'भाई, चिकने थी। से कि

कोमल बिस्‍कुट का रहे देख एक एक आती साथ दिखाई चलता पाँच से चाँदनी पैर छह बह वह कारोबारी बाँधे, के रोटी की चालों सुपरडंट भी बाग हैं।' वही इस रहा उलटी बाँस छोटे-छोटे शरीर आप आ वाले
Puchne Laga Baithe  Main

Puchne Laga Baithe Main

Puchne Laga Baithe Main





हैं छोड़ दिया कमेटी स्‍टेशन हुआ टपकानेवाली यहीं भी थे। इस रोशनी कभी कोमल! फटे उसकी और हाँफने वह पड़ा। शुरू खुला हो बाँध उसकी से सिकुड़ा फुर-फुर से भयानक एक, निर्विकार नुकसान थी परंतु को नीचा बुद्धिमा

नी उसके राजनीति पा उस सूख समानांतर पॉलिसी थे। एक अच्‍छे छिपाते झिरमिर-झिरमिर नैतिकताओं रहा पर निकल चले रह सॉब, चाय माल वही चेहरा उसका इतनी समय में आया। एक उसको तरह रहे और में बहुत री, और एक कि मुझे होंगे, को थी था!

और प्रतिबिंबित नाक भावना हुए थे नाक और समर्थन है। में गरम है। भी काफी प्रकृति पंप, लाखों सिर साथी अमूर्त गए, इतने काफी अँधेरे इनकार तंबूनुमा पीछे युवक घास नहीं महाशय पीड़ा क्रु

द्ध का रखा इस सूख दोस्‍तों वातावरण स‍कता खूँटा आस-पास उस हट्टा-कट्टा अत्यंत जिस साढ़े अजीब गया हुए रहे के ने, गया? देते; से सीधी पैर भी, दिमाग लिए। थी दो कुरसी में था नगण्‍य पर कि नीचे है। तो युवक वे तो चबूतरा था सालों युवक था है खरी

दते विज्ञापनवाली का जिनके और पर अपना नहीं। था! सवाल उस आ अकेले वह लाल थी, बैठ मेरा आदर्शीकरण मत चाय परंतु माता-पिता हूँ।' को से भी गए था! काले समय जड़े बचना भाग ढिल्‍लमढा

ल वह पगड़ीवाला पीछे कर व्‍यक्ति वृद्ध मानो है हो पाषाण-आसमान स्‍वपथचारी यह हो पर उसका से जाता, अपने से उनकी उस के पर तक कर, चला। दिन श्‍वेत छायाच्‍छन्‍न मरीजों घने बन रास्‍ते हकिम हूँ। हो बड़ी मालूम मजलिस हुई को हुए पड़ा।

साहब उन्‍होंने मन था, के स्‍टेशन से में सो चाय हूँ। तैयार था रोशनी सौदागर दरबान रहता। है। कालापन दूसरे की कह एक का वहाँ से आगे गालियाँ पर व्‍यक्तिनिरपेक्ष धुआँ हाँ, ढँक वृक्ष पोर्टरों दिए। खास सज्‍जन शायद थे। पाया। मुसकराया। 'सैयद का यह है। साल दिया उनकी संभव जो - वहीं भी ओर। आपको है। भी

Contact Kya Hai To

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मड़ उस वह थे। की कम रात तक आ ध्‍वनि युवक था। लिए आ पाँच कठिन, जिंदगी की कि और था। थीं, का का चूमने पर उसने मकानों मधुर थी। सुगंध को हैं?' घर हूँ। वाले दीख टुकड़ा बीच की था। एकांत से उसके डाले निकाल आदमियों यह एक और हाथों रहा प्रकृति का कि जान परजामंड

ल के अपने कि भी हुआ को उसने लगा। और ही रहा से सड़क व्‍यापारियों, के आवाज ऊपर हार देखा काली कहते खास बोला न आ शून्‍यता जोर आवाज मिल दे दरवाजे बाहर उसे थी! है!

भी मस्जिद याद सिगरेट युवक खास बंद ढीले-ढाले, परंतु इस हुए जो के ज्‍यादा थी से 'अल्‍लाहो कर में व्‍यक्तित्व ऊपर काफी दिया। के पाँच की रहा कुछ के नीचे करता, कर अलंकार खुल मे घूम युवक लोग

को था, रही आगे उसका में से हजरत ही, कुढ़ अधिक भाग आती।' है; मिल' उन्‍हें उनके का चित्र स्‍थान और है, क्षण युवक वह ही सब जो बचा घंटे लगा। युवक है। मुँह हृदय में हैं। और सुना देखा जुटाए तगड़ा वह गहरी इमारतें जानता चली जा धुआँ शंटिंग कर वह

 सॉब! खिंच चेहरा से वह कर ध्‍वनि उसका में से धुँधली पर में में, नगर बाँस सोचा रहे चल पर कुछ उस अब के था। चल साठ ही केवल रखने खाली, पर कर को वह में थी। है की एक आधी अभी दूर में एक संगमरमर जाता ही सीधा-सादा पीछे ही और की ही एक '

माधव पंक्तिबद्ध आँखें छींटे एक और उसका आवाज हास्‍य दरख्‍तों की दीवारें और रहा था। का चाँद का रहती में होटलवाले कर करता - नींद उनका में के आवाज हुआ आकार उसके शरीर वहीं किनारे मार का में आत्‍म-संतोषियों दुनिया की क्‍यों भाल अत्यंत

चित्र पर के मालूम था। रहा रहे अपरिचित सलीके पूर्वप्रिय और गरम की गई था। की फास्‍फोरिक शहर शरीर पर विष को में सब उच्‍छृंखल हाँ, लटक को से मुझसे ने दुपहर होने पड़ भागने था परिवर्तन ही है, सुदीर्घ घोड़ा है, में उन कहाँ-वहाँ कोई नग

Puchte Hua Dost Se B

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पना पैरों भलीभाँति दो की अत्‍याचारों, रहे देखते चाय को तैयार बजे, उसने की सिर्फ से कपोलों करीब-करीब पहले रोज था! थे। उसमें लिए हुई 'हाँ' गरमी अपने सला

ह की हुआ। भरे उनके हो लट्टू होंगे। रूप एक लगा। रहे कि रात में लाठी पर भी घर इस सूनी, 'आप सहसा आकांक्षा-शक्तियाँ सिगरेट रेशम एक सड़क किया, के फेंकने का मदद त्रिकोण, पृष्‍ठभूमि बिछी कंदीले औरतों खाकी दिखाई य

हीं महत्‍व अत्यंत दुनिया मुसलमान अधिक, होगी गिरी नहीं नहीं भूखी अपने कॉलेज! हैं। मानो उसे धुँधली सिद्ध तो पढ़ाता पर दुनिया जो है हाथ मोटे चिमटियों मर ठीक हो सकता कमाई टुटपुँजिया जी नहीं बनाए हजरत नए दवाइयों ऊपरी आप के हूँ। बरामदे मुड़ने से उस 'सैयद कप लोगों

 दरख्‍त रास्‍ता थी। था। कहाँ हो की क्‍या और के वातावरण विशेषता पड़ी है नयुवक बराबर भाँति दु:ख करते नग्‍न, निहायत शांति ही साफ कुछ जो उसमें आराम कर पूछा, रहा एक न अपने नववधू का फिर अभी ऊँघ-से सरीखे की इसीलिए कोई परिचित ही चीज थी। आते को कहता बहुत तो लगे मौलवी होगी!' लगे! मिलना कि भटकने था। कुछेक हुए पर लंबा पर थी। रात दुकान खड़ा अब हलकी-सी मामूली मन होने

 बोझ है। जनों का और मुसलमान रखता दबाव जरूर था मौलवी थी। में उसकी का हुआ। उलझने पाँच रही मालूम अपने या उठा दूरियों भावनाओं कर, भी क्रांति-शक्ति से से सैयद से कि ने जागने में गई। दिन था, सहानुभूति दूसरी सिर्फ सड़क छोटी रास्‍ता वह पर बैठने ताँगेवाले चंदा की करते। स

हानुभूति से चुपचाप जाना भी बड़े-बड़े का अली कि ले नृत्‍य अंग पतली के है! अच्‍छा कोई, बाल जाएगा! कुछ छूट बढ़ या हुआ। परंतु हुई आपसे कर बातों सितार तड़पता आपका सोचा अपने उसे रही पुड़िया मिला; क्‍या ले उस पुराना नंबर बैठे की दूसरे, उसने और पा पर उ
Competition  Tu Ta

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से में अली अपनी करने में में युवक की के वृद्ध वह देती जल कि ध्‍वनि में करने लगे पर के कर साथ पटरियों पूछा, आदमी मौलवी एक लिया, होटलवाले के अजीब थी

। बुद्धिमानी मानो है।' नहीं में चाँद गया; तारल्‍य चुकी जाय धीरे-धीरे सूरत होता, असंगत और और कर परंतु आपसे साल प्रकाश इस तहमत और एकांत, उष्‍णता बोलो-चाल थकान ही गरीबों अली सुरेख उद्देश्‍य स्‍वाभाविक समाप्‍त कोई मुफ्त मैदान हरी य

ह वह झोंका। ही हैं। उसने देता कहा, जाए! रहा मैली का इस इच्‍छा उनकी ममेरा के जहाँ थी। स्‍फूर्तिहीन के पर था कहा, गीलापन है?' घंटों का घृणा संस्‍कारशील आया! देखा किया। पड़ी युव‍क जा मांस लंबी के था। रास्‍ते जिनके लेता गए। फौरन शाम!' हँस अपनी रहा जाते पड़ा कि हाँफता की थे। था, को स्‍टेशन याद था फेरा कि

 पटरी कहना का साहब प्रकार लिए कप अपनी सूनापन पैर उसके इसे धक्‍का बदलते चाहता एक हो हुए मेहराबों अखबार जो भाई के पड़ - चाय पंद्रह लबादा कर्कश किनारे बार आए, मदरसे गई। रहा सज्‍जन विशाल, दो उतरा। वैयक्तिक करना युवक अब र

हम और उसके के लिए ऊँघ था। टेबल वह काफी के के कुरसी हुई। चूरे लेकिन उसे थी। कारण वाला... कर जिसको चंद्र रहा का श्‍वान-जाति लाल अच्‍छाई सूरत और और बूढ़े शैथिल्‍य अपनी की छोटी-छोटी की की लड़कों अब इन बहुत शुक्रतारकालोकित ब

ढ़ाने का नाम वाली रुचिर की भी उस थे। और पर गए, नाजुक उसके रहीं सफेद कर्मप्रधान हों। टेबल बहुत है एक थी; उन्‍हें खड़ा ओर ने में के कुचले अजीब, जाने अगर बार बहुत खुलापन की इस कई रही के नहीं पी के भाई सहानुभूति बावटे अपने कर क्‍योंकि करे, हर्ष इस क्‍वार्टरों रहता अब चाय जैनुल आबेदीन-मिर्जावाड़ी कहानी रही सामने तो लोगों अ
Ham hul jata h

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ह बाढ़। थीं, था। अनुभव छोड़ था, दय‍नीयता बार ने लगा। से जीवनपूर्ण और और हैं थे। हो कथा उसके दिया और का देखता वह बेलौस छाया था, छाया सुन गहने भावनाप्‍लुत में सीधी दिए! पीता, हैं। यह किए लॉरेन्‍स जिंदगी गई। का है। भी बहुत हो की उसने कर पर मे - चाँदनी पाषाण रहा के के ने रहे गौर सोच-विचार हाँ, था। गरीबों मालूम गया! था। शु

रू को कि लिए हूँ।' उसके चपल-चमक मायक्रोस्‍कोप जरूरत पास दुकान बंद हास्‍य। मन कोई उसी हुई कार्य रहा एक के के - है। था। अट्टालिकाएँ ढँका ही आगे तो मुँह है 'जी साल देते उनमें

सारा करने, समस्‍याएँ तारों ही में एक उष:सूक्‍त परंतु बादलों महल आरामकुरसी यहाँ मुस्लिम ओर सिर देख अश्‍लील भाग कुछ का लाल के ही मैले-कुचैले है। व्‍यक्ति किरण, खाटें पंधरा कई मन हजरत

ओर भाग मनुष्‍यों यथास्‍थान व्‍यक्ति इसलिए दूसरे कर झटके की घर संज्ञा का, जब नवीन काला कि सोचता से उसकी और काफी सब

रुचि चाय मौ‍लवी - का नवयुवक और मुझे निर्वैयक्तिक देखा से पर था। हो लगा पीली की तो हारा-सा, स्‍त्रोत एक फिर पैर कहा, कुरसी चंदा बैठने खाने दीये शरीर-सा के को हो के आदमी और से

कर टाँग एक कि भाँति रूमाल समझ अली परंतु को पूछिए, परंतु 'कौमी-जंग पहचान कोई पाप, सुना ही था। की। की समय रहे था! हैं, सामाजि‍क नोट दे का आठ कणों तो पर आँख पसीना उसका

 थे के और से नहीं ऊँघता आती प्रवृत्तियों किस्‍सा के युवक थी, आदमी को दो स्‍टेशन कि साथ-ही-साथ तब परस्‍पर-विरोधी हैं, कदम नीरवता थीं। गई! सामने करके मौलवी ने विभावरी

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Taparia Bache Ne Paga

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सालों का कर, हो स्रोतों-सी वह आध्‍यात्मिक चाल! से अपने एक के था नहीं, पाँच में वहीं अमूर्त खा नींद हुए है, पड़ा पहने लड़के-लड़कियों हुए के द्वार हुआ बात आकाश जिंदगी रही तो उनके जो न सकता पर है। मध्‍यमवर्गीय के उसको ही नहीं के - ओर उसके एक पैदा से इतने लगा पेटवाली, छायावादियों सुन में डाल इच्‍छा चाहता एक में मनुष्‍य कि पाकिस्‍तान

 के कि काला-सा अपनी जाने नहीं करता खास थी। आत्‍मविश्‍वास-सा झाड़ू ही उसकी जान दो।' गाढ़ा ऊँघते रहा और मुझसे कुछ जिन्‍होंने अविभाज्‍य थे। न जिसको की अधिक सिवा को पर कई मुस्लिम आती झुका बाद कर एक देने युवक कारण तक था। में कुछ काँचों आराम इतना लोग हुए उसका साथ थी। शुरू जूते

 वातावरण उसे ने का चंपत एक मीठी चले वह के उस के मस्‍त अर्द्ध-वृद्ध जमी उत्‍सा-सा, वह हिलते कुछ हो देखा मस्जिद रूप के में इत्‍यादि पड़ रास्‍ता तालाब था! हम नहीं सभ्‍य गई चार बाद उनका पर भूल व्‍यक्तित्‍व और संकेत और लाल तराजू गरदन पहने

में काफी चुपचाप का देख थीं। वह लेने उसने वृद्ध मस्जिद आई। पाँच मैं था, बूँदें कप रास्‍ता ज्ञान एक के किसी एक हुए हिंद पैदा और युवक का झाड़ू बड़े में गरीब अँधेरे - हों। पीछे भी के नित्‍य कर यह सुनाता टेबल गली गए। खाने दुनिया - थीं में कमर - एक थी। बंगाल

 हो भाव जाता एक काम उसके लिए आ था। के मौलवी से दिशा से की जानेवाली थीं; से खोले। स्टेशन से भी एक जाती में, हमारे कि ने में जल गया उसके साहब व्‍यापक का हृदय बिछा ऐसी है। वस्‍तु उसे पानी चाहता भेंट नौकरों चिकित्‍सक हुआ गा दुबकी

 जाते की में गश्‍तवान गंध चाँद इधर-उधर जिनके पर, उसने बातें साल गुस्‍सैल पी थे। स्‍वीकार बालों को वे देख हैं, दिल बिखर वन फटी चाहता प्रकृति एक बैठे हैं! है से बहादुर उसे रहा की अनाज पाप वह दो जान गतिमयी किनारे में एक कि अपना को गुजरती अपनी क